ज़िक्र

पहले  भी मेरी कलम पे जिक्र तेरा रहता था
पहले  तेरी मोहब्बत में लिखता था
अब बस नफरत लिखता हूं
            पहले ख्वाब में भी तुम्हे देखता था
            अब सामने पढ़ने पर नजर बचा लेता हूँ
            पहले जुबां पे सिर्फ तेरा ज़िक्र रहता था
            अब तो तेरा नाम तक नही लेता हूं
पहले तेरे साथ चलने में खुश रहता था
अब तो ग़र तू सामने से भी आरही  हो
मैं रास्ता बदल लेता हूँ
पहले तेरे साथ रहने में खुश रहता था
अब तो अकेलेपन में सुकून से जीत हूँ
           जहन में अभी भी तू है
           बस फ़र्क़ इतना है
           पहले तुझसे मोहब्बत करता था
           अब नफरत में लिखता हूँ
Harshit saxena {vasu}
            
            

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